गुरुवार, 21 जनवरी 2010

श्रीमाली ब्राह्मणों का उद्भव-

श्रीमाली ब्राह्मणों के इतिहास की जानकारी का सर्वोत्तम उपलब्ध प्रमाण श्रीमालपुराण है जिसे श्रीमाल माहात्म्य भी कहते हैं, इसके लेखक के अनुसार यह स्कन्ध पुराण का ही एक भाग है। श्रीमाल पुराण विक्रम की तेरहवीं सदी के पूर्वाद्ध की रचना प्रतीत होती है। यह पचहत्तर अध्याय व सैकड़ों श्लोको में संस्कृत भाषा में रचित है। श्रीमाल पुराण में श्रीमाल नगर एवं श्रीमाली ब्राहम्णों के संबंध में कथानक निम्न प्रकार से है- भृगु ऋषि के यहाँ एक बहुत सुन्दर कन्या का जन्म आसोज कृष्णा अष्टमी को हुआ। उसका नाम श्री (लक्ष्मी) रखा गया। उस कन्या का विवाह क्षीरसागर (बंगाल की खाड़ी) से भृगु के यहां आकर विष्णु भगवान ने किया। गरूड़ पर सवार होकर श्री के साथ विष्णु भगवान (प्रतीकात्मक) त्रयंबक सरोवर आये। उस कन्या ने सरावेर में स्नान किया जिससे उसका मानवीय जड़त्व मिटा और दिव्य देवत्व प्राप्त हुआ। तब श्री(लक्ष्मी) की इच्छा हुई की मैं यहां एक नगर बसाऊँ। इस प्रकार श्री के विवाह के अवसर पर श्रीमाल नगर की नींव पड़ी और तभी से श्रीमाली ब्राह्मण जाति का उद्भव हुआ। कालान्तर में श्रीमाली धीरे-धीरे मेवाड़ और मारवाड़ में फैल गये। इनकी बोली गुजराती से बहुत मिलती है। मारवाड़ी बोलचाल मे सिरमाली बोले जाते है और लिखावट में श्रीमाली लिखा जाता है। श्रीमाल नगर जो आज भीनमाल कहलाता है गुजरात व राजस्थान की सरहद पर बसा हुआ है इसलिए श्रीमाली मारवाड़ी व गुजराती मिश्रित बोली बोलते है। श्रीमालियों में सगाई अपने गोत्र में नहीं करते। माँ का गोत्र और जो नाना के गोद चले जाये तो सात पीढ़ी तक टालते है। सगाई वर-वधु के माता-पिता आपस में बातचीत कर निश्चित करते हैं। श्रीमाली मृत्यु होने पर उसे जलाते हैं। अपने किसी नजदीक वाले के मरने के समाचार सुन लेने पर कपड़ों सहित उनको स्नान करना पड़ता है। यह मरने के पश्चात उस व्यक्ति का क्रियाकर्म, मौसर, श्राद्ध, बरसी और छमछरी (मृत्यु की छमासी) आदि कार्य पूर्ण रीति के साथ करते है।

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